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35 साल पुरानी इस गऊशाला में गाय की मृत्यु होने पर बना दी जाती है समाधि,विधि-विधान व मंत्रोच्चारण से होता है गाय का दाह संस्कार

4th पिलर न्यूज,गाजियाबाद
मेरठ रोड औद्योगिक क्षेत्र स्थित श्री शिव गौशाला पंजीकृत में बीमार गायों का निशुल्क उपचार होता है। पिछले 35 सालों से इस आश्रम में संग्राम सिंह गायों की भक्तिभाव से सेवा कर रहे हैं। गायों से उनका प्रेम इतना अमिट है कि गायों की मृत्यु होने पर गऊशाला स्थल के आसपास ही विधि-विधान से पूजा अर्चना कर दाह संस्कार किया जाता है। गऊशाला प्रांगण में ही कुछ गायों की समाधि भी बनी हुई है। दरअसल, औद्योगिक क्षेत्र में खुर्जा निवासी संग्राम सिंह 35 सालों से गायों की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने गौ रक्षार्थ के लिए इसी आश्रम में 14 साल तक अखंड ज्योति और रामायण का अखंड पाठ भी कराया है। 27 अगस्त 2001 को अखंड ज्योति की शुरुआत की गई थी, जो 27 अगस्त 2015 को विधि विधान से संपन्न कराई गई। गऊशाला में मंदिर भी बना हुआ है, जिसमें राधा-कृष्ण, शंकर, हनुमान, काली मां, भैरव बाबा आदि की मूर्तियां स्थापित हैं। इसी से सटी गऊशाला है, जिसमें करीब 300 गायें हैं। हालांकि गऊशाला में गिनी-चुनी गायें ही दूध देती हैं। यहां बुजुर्ग और बगैर दूध देने वाली गायों को पाला जाता है। संग्राम सिंह इन गायों की जीजान से सेवा करते हैं। इसके अलावा आसपास के लोग भी उन्हीं के साथ इन गायों की सेवा में लगे हुए हैं। आश्रम में तमाम गायें देशी नस्लों की हैं। इससे गायों की देशी नस्लों को बढ़ावा मिल रहा है। बीमार गायों के ईलाज के लिए सरकारी पशुचिकित्सालय से चिकित्सक आते हैं। इसका पूरा खर्चा संग्राम सिंह वहन करते हैं।

कपला गायों से विशेष लगाव
गायों से अटूट पे्रम रखने वाले संग्राम सिंह का कहना है कि उनके आश्रम में ज्यादातर देशी नस्ल वाली गाएं हैं। कपला गाय से उनका विशेष लगाव है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को भी कपला गाय सबसे अधिक प्रिय थी। कपला गाय सबसे सुशील स्वभाव वाली होती है। इसके अलावा आसपास के क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं भी कपला गाय से विशेष मोह रखती हैं। विशेष पर्व पर विधि-विधान से उनकी पूजा अर्चना करती हैं।

गऊशाला प्रांगण में बनी हैं गायों की समाधि
संग्राम सिंह के मुताबिक बीमारी के बाद जिन गायों की मौत हो जाती है। उन्हें विधि-विधान और पूजा अर्चना के बाद गऊशाला प्रांगण में ही दफनाया जाता है। वहीं कपला नस्लों वाली गायों की समाधि बना दी जाती है। गऊशाला प्रांगण में करीब 284 गायों को जमीन में गाढ़ा गया है। गौ रक्षार्थ के लिए संघर्ष कर रहे ठाकुर संग्राम सिंह का कहना है कि वे तमाम हिंदू संगठनों से जुड़े हैं। पुलिस व गायों की रक्षा के लिए गठित संगठनों की मदद से कसाईयों से हजारों गाय मुक्त कराई हैं। जिनका पूरा लेखा-जोखा उनके रजिस्टर में दर्ज है।संग्राम सिंह का कहना है कि गायों की सेवा पर रोजाना 20 से 22 कुंतल चारा खर्च हो जाता है। उन्होंने बताया कि आसपास के गांवों के किसान आते हैं, जो गायों की गोबर ले जाते हैं और बदले में गायों के लिए चारा दे जाते हैं। इसके अलावा कई संस्थाएं गायों की रक्षा के लिए अपना सहयोग प्रदान कर रही हैं।गौरक्षा दल में दिल्ली, हरियाणा, हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर, बिजनौर, पंजाब, राजस्थान, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर आदि जिलों में गौरक्षा दल गायों को बचाने में मदद करते हैं।
संग्राम को देखते ही पहचान लेती हैं गायें
गऊशाला की तमाम गायों की ऐसी पहचान है कि एक दिन भी नहीं मिलने पर वे संग्राम सिंह को देखते ही रंभाने लगती हैं। इसके अलावा श्री सिंह भी गायों के थनों,ऊपर, नीचे यानि सारे शरीर पर हाथ फेर कर दुलार करते हैं। लेकिन तममा गायें टस से मस नहीं होती हैं। गायों के प्रति उनका प्रेम किसी से छिपा नहीं हैं। संग्राम सिंह का कहना है कि गायों को बचाने की उनकी मुहिम काफी पुरानी है। मुजफ्फरनगर में स्वामी कल्याण देव से ही उन्होंने गायों को बचाने की प्रेरणा ली है। गाजियाबाद के अलावा खुर्जा बुलंदशहर के ग्राम हैरोली में भी श्री शिव गऊशाला है, जिसमें डेढ़ सौ से अधिक गायों की निश्ुाल्क सेवा की जाती है। गायों की बीमारी, रखरखाव और सेवा का पूरी जिम्मेदारी उन पर ही है।
सरकार से मदद की दरकार
लंबे अर्से से गायों की सेवा में लगे संग्राम सिंह का कहना है कि गायों की बचाने की मुहिम काफी पुरानी है। लेकिन आज तक भी प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार से उन्हें कोई मदद नहीं मिली है। गायों को वे अपने परिवार के सदस्यों की तरह पालते हैं। इसके अलावा कसाईयों से गायों को छुड़ाने के लिए छोटा हाथी नामक वाहन भी है, जिसमें कटान के लिए ले जा रही गायों को मुक्त कराकर लाया जाता है।

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